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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verses 5–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verses 5–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 5-8

संस्कृत श्लोक

आगमापायिना नित्यं दन्तकेसरशालिना । विकासस्मितपुष्पेण प्रतिक्षणमलंकृतः ॥ ५ ॥ भुजशाखो घनस्कन्धो द्विजस्तम्भशुभस्थितिः । लोचनालिविलाक्रान्तः शिरःपीठबृहत्फलः ॥ ६ ॥ श्रवदन्तरसग्रस्तो हस्तपादसुपल्लवः । गुल्मवान्कार्यसंघातो विहङ्गमकृतास्पदः ॥ ७ ॥ सच्छायो देहवृक्षोऽयं जीवपान्थगणास्पदः । कस्यात्मीयः कस्य पर आस्थानास्थे किलात्र के ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

यह शरीर उपेक्षणीय है, यह दशनि के लिए वृक्ष के रूपक से उसका वर्णन करते हैं । यह शरीर वृक्ष के तुल्य है । दो भुजाएँ इसकी शाखाएँ हैं उन्नत कन्धा इसका तना है, दो नेत्र इसके खोखले हैं, मस्तक इसका बड़ा भारी फल है, यह द तरूपी पक्षियों के बैठने के स्तम्भ के समान उत्तम रीति से खडा है, यह दो कर्णरूपी कठफोडवा पक्षियों की चच के आघात से जर्जरित (छिद्रयुक्त-सा) है, हाथ और पैर इसके सुन्दर पत्ते हैं, रोग आदि इसमें लता स्थानीय हैँ । जैसे कुल्हाड़े आदि से वृक्ष काटा जाता है, वैसे ही शस्त्र आदि से इस शरीर का भी उच्छेद, किया जा सकता है, 'द्वा सुपर्णा" इस श्रुति मेँ प्रसिद्ध (जीव और ईश्वररूप) पक्षियों ने जिसके हृदय में अपने निवास के लिए घोंसला बना रक्खा है, यह उत्पन्न और विनष्ट होनेवाले दाँतरूपी केसर से शोभित हासरूप पुष्पों से हर घड़ी अलंकृत रहता है अर्थात्‌ जैसे वसन्त आदि फूल की ऋतु आने पर वृक्ष उत्पन्न हो हो कर मुरझानेवाले एवं केसर से शोभित होनेवाले फूलों से अलंकृत होता है, वैसे ही यह शरीर भी हर्ष के समय में उत्पन्न होकर नष्ट होनेवाले एवं दाँतरूपी केसरों से सुशोभित होनेवाले मन्दहाससे शोभित होता है। सुन्दर कान्तिरूपी छायावाला यह देहरूपी वृक्ष जीवरूपी यात्रियों का विश्राम-स्थान है। यह किसका आत्मीय (मित्र) और किसका शत्रु है ? इस देहरूपी वृक्ष में प्रेम ओर द्वेष करना व्यर्थ है अर्थात्‌ देह के साथ जीव का कोई भी वास्तविक सम्बन्ध नहीं है, इसलिए यह किसी का आत्मीय नहीं है, अतः इसके प्रति आस्था ओर अनास्था ही क्या ?