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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verses 54–55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verses 54–55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 54,55

संस्कृत श्लोक

मानावमानबहुला बहुलाभमनोरमाः । शरीरमात्रबद्धास्थं घ्नन्ति दोषदृशो नरम् ॥ ५४ ॥ शरीरश्वभ्रशायिन्या पिशाच्या पेशलाङ्गया । अहंकारचमत्कृत्या छलेन छलिता वयम् ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

मान और अपमान से वृद्धि को प्राप्त हुई एवं प्रचुर लाभ से सुन्दर लगनेवाली दुष्ट दृष्टियाँ केवल शरीर में ही परमादर करनेवाले पुरुष को मृत्यु के वशीभूत कर देती है। शरीररूपी गड्ढे में रहनेवाली मनोहर भोगतृष्णारूपिणी पिशाचीने कपट से हमें संसार में पटककर हमारा सर्वस्व हर लिया- हमें ठग लिया है