Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
न किंचिदपि दृश्येऽस्मिन्सत्यं तेन हतात्मना ।
चित्रं दग्धशरीरेण जनता विप्रलभ्यते ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
जब इस दृश्य प्रपंच में कोई भी वस्तु सत्य नहीं है,
तब उसके मध्यवर्ती होने से यह शरीर भी सत्य नहीं है । अपने आप जले हुए (असत्य) शरीर से
जनता ठगी जाती है, यह महान् आश्चर्य है