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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 18, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

दिनैः कतिपयैरेव निर्झराम्बुकणो यथा । पतत्ययमयत्नेन जरठः कायपल्लवः ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि जनता को ठगने से इस शरीर का कोई प्रयोजन सिद्ध होता, तो किसी अंश में वह नन्तव्य भी होता, पर वह भी तो कुछ नहीं है, ऐसा कहते है । कुछ ही दिनों में वृद्धता को प्राप्त हुआ यह शरीररूपी पत्ते झरने के जलकणों (सीकरों) के समान अपने आप गिर पडता है- मृत्यु को प्राप्त हो जाता है