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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, Verses 18–19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 19, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

नवं नवं प्रीतिकरं न शिशुः प्रत्यहं यदि । प्राप्नोति तदसौ याति विषवैषम्यमूर्च्छनाम् ॥ १८ ॥ स्तोकेन वशमायाति स्तोकेनैति विकारिताम् । अमेध्य एव रमते बालः कौलेयको यथा ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि बालक को प्रतिदिन मन को प्रसन्न करनेवाली नई-नई वस्तुएँ न मिले, तो वह विष के समान असह्य चित्तविकृति से मूर्च्छा को प्राप्त हो जाता हे । बालक कुत्ते के समान थोड़े से खाने पीने की वस्तु देने आदि से वश में आ जाता है, थोड़े से घुड़कने आदि से विकृत हो जाता है ओर अपवित्र में (विष्ठा आदि में) क्रीडा करता है अर्थात्‌ जैसे कुत्ता थोड़ा-सा खाना देने या पुचकारने से वश में हो जाता है, थोड़ा-सा घुड़कने या छड़ी आदि दिखाने से बिगड़ जाता है और विष्ठा आदि से अपवित्र स्थानों में खेलता है, ठीक वैसे ही बालक भी है