Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 19, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 19, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
विकल्पकल्पितारम्भं दुर्विलारसं दुरास्पदम् ।
शैशवं शासनायैव पुरुषस्य न शान्तये ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
बाल्यावस्था में बालक तुच्छ कार्य को भी नन्हे बच्चे या निपट पागल के कहने-
मात्र से बड़ा महत्त्व दे डालते हैं, अनेक दुश्चेष्टाएँ करते हैं और किसी प्रकार की भी प्रतिष्ठा को प्राप्त
नहीं होते, इसलिए पुरुष की बाल्यावस्था, गुरु द्वारा किये गये ताडन आदि से उत्पन्न दुःख भोगने के
लिए ही है, सुख के लिए नहीं है । अर्थात् निष्फल कार्यप्रवृत्ति और सम्पूर्ण दुष्कर्मो का आवासरूप
बाल्यकाल किसी प्रकार की भी शान्ति प्रदान नहीं करता, उक्त काल में प्रायः प्रतिक्षण गुरूजनों के
समीप दण्डित होकर दुःखित होना पड़ता है और किसी प्रकार की भी प्रशंसा प्राप्त नहीं होती