Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
असत्यं सत्यसंकाशमचिराद्विप्रलम्भदम् ।
स्वप्नाङ्गनासङ्गसमं यौवनं मे न रोचते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यौवन है तो निरा असत्य पर सत्य-सा प्रतीत होता हे, शीघ्र ही लोगों को अपनी वचना का शिकार बना
डालता है-धोखा दे देता है-और स्वप्न में दुष्ट सत्री के समान है, इसलिए यौवन मुझे नहीं रुचता