Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
कान्तावियोगजातेन हृदि दुःस्पर्शवह्निना ।
यौवने दह्यते जन्तुस्तरुर्दावाग्निना यथा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे वनाग्नि से वृक्ष जलाया जाता है, वैसे
ही युवावस्था में प्रियतमा के वियोग से उत्पन्न दुःसह शोकाग्नि से जीव जलाया जाता है