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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

शरीरखण्डकोद्भूता रम्या यौवनवल्लरी । लग्नमेव मनोभृङ्गं मदयत्युन्नतिं गता ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

शरीररूपी छोटे बन में उत्पन्न हुई बड़ी रमणीय यौवनरूपी मंजरी जब उत्कर्षं को प्राप्त होती है बढती है तब अपने से संबद्ध मनरूपी भ्रमर को उन्मत्त कर डालती है । अर्थात्‌ जैसे छोटी वाटिका या कुज में उत्पन्न रमणीय फूलों का गुच्छा जब बढता है, तब उसमें बैठे भँवरे को मोहित कर देता हे, वैसे ही शरीर में उत्पन्न रमणीय प्रतीत होनेवाला यौवन मन को मोहित कर देता है