Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
शरीरमरुतापोत्थां युवतामृगतृष्णिकाम् ।
मनोमृगाः प्रधावन्तः पतन्ति विषयावटे ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिवर, शरीररूपी मरुभूमि में कामरूपी सूर्य के ताप से प्रतीत हो रही यौवनरूपी
मृगतृष्णिका के प्रति दौड रहे मनरूपी मृग विषयरूपी गड्ढे में गिर पडते हैं । अर्थात् जैसे मरूभूमि मे सूर्य
के ताप से प्रतीत हो रही मृगतृष्णा के प्रति जल की इच्छा से दौड़ रहे मृग गड्ढे में गिर पडते हैं, वैसे ही
शरीर में कामके सन्ताप से भासित यौवन के प्रति दौड़ रहा मन विषयों में फँस जाता हे