Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
शरीरशर्वरीज्योत्स्ना चित्तकेसरिणः सटा ।
लहरी जीविताम्भोधेर्युवता मे न तुष्टये ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
शरीररूपी
रात्रि की चाँदनी, मनरूपी सिंह की अयाल (गर्दन के बाल) ओर जीवनरूपी समुद्र की लहरी युवावस्था
से मुझे सन्तोष नहीं होता