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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verses 37–40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verses 37–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

तावदेव विवल्गन्ति रागद्वेषपिशाचकाः । नास्तमेति समस्तैषा यावद्यौवनयामिनी ॥ ३७ ॥ नानाविकारबहुले वराके क्षणनाशिनि । कारुण्यं कुरु तारुण्ये म्रियमाणे सुतै यथा ॥ ३८ ॥ हर्षमायाति यो मोहात्पुरुषः क्षणभङ्गिना । यौवनेन महामुग्धः स वै नरमृगः स्मृतः ॥ ३९ ॥ मानमोहान्मदोन्मत्तं यौवनं योऽभिलष्यति । अचिरेण स दुर्बुद्धिः पश्चात्तापेन युज्यते ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

तभी तक राग-द्रेषरूपी पिशाच विशेषरूप से इधर-उधर घूमते-फिरते हैँ, जब तक यह योवनरूपी रात्रि सम्पूर्णतया नष्ट नहीं हो जाती । रागद्वेष आदि सम्पूर्ण दोषों की जननी युवावस्था ही है, यह भाव है