Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 20, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 20, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
विनयभूषितमार्यजनास्पदं करुणयोज्ज्वलमावलितं गुणैः ।
इह हि दुर्लभमङ्ग सुयौवनं जगति काननमम्बरगं यथा ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
बाल्यावस्था ओर वृद्धावस्था में अज्ञान ओर अशक्ति से पुरुषार्थ साधन नहीं हो सकता ओर
युवावस्था विविध दोषों से पूर्ण होने के कारण पुरुषार्थ साधन के योग्य नहीं है, ऐसी परिस्थितिमें पुरुष
को कभी भी साधनसम्पत्ति से मोक्ष की आशा नहीं है, ऐसी आशंका कर सम्पूर्ण यौवनो की निन्दा नहीं
की जाती, किन्तु दुर्योवन की ही निन्दा की जाती है। सुयौवन का तो पुरूगार्थ मँ ही पर्यवसान होता है,
ऐसा लक्षण द्वारा दिखलाते हुए उसकी दुलभिता को दिखलाते है ।
ब्रह्मन् विनय से अलंकृत, साधुओं के आश्रम के समान शांतिप्रद, करुणापूर्ण ओर शम, दम आदि
विविध गुणों से युक्त यौवन इस संसार मेँ इस मनुष्य जन्म में भी वैसे ही दुर्लभ है जैसे कि आकाश में
वन | अर्थात् जैसे आकाश में वन की स्थिति अतिदुर्लभ है, वैसे ही इस संसार में विनययुक्त, पूज्य
मुनिजनों में रहनेवाला, दया से परिपूर्ण ओर शम, दम आदि गुणों से परिवृत सुयोवन मनुष्यजन्ममें भी
अतिदुर्लभ है, फिर अन्य योनियं मे तो कहना ही क्या है २