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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोलेऽङ्गपञ्जरे । स्नाय्वस्थिग्रन्थिशालिन्याः स्त्रियाः किमिव शोभनं ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

जिन स्त्री-शरीरों में युवकों को रमणीयता की भ्रान्ति होती है, उनके स्वरूप को विवेचनपूर्वक दशनि के लिए इस सर्ग का आरम्भ करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, नस और हड्डियों के ग्रथन से शोभित मांसमयी स्त्री के रथ, गाडी आदि के समान चंचल शरीररूप पिंजडे में, जिसे युवक रमणीय-सा समञ्जते हैं, वह कौन वस्तु है ? अर्थात्‌ कुछ नहीं है

सर्ग सन्दर्भ

बीसवाँ सर्ग समाप्त इक्कीसवाँ सर्ग प्रत्यक्ष नरकसमूहमूत सम्पूर्ण अंगोवाली तथा मनुष्यों के नरकपतन की हेतु स्त्रियों की निन्दा |