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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

त्वङ्मांसरक्तबाष्पाम्बु पृथक्कृत्वा विलोचनम् । समालोकय रम्यं चेत्किं मुधा परिमुह्यसि ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ को ही विस्तार से विशद करते हुए पहले युवकों को जिन नेत्रों में छहावभावरूप विलास की भ्रान्ति होती है, विवेक के होने पर उन नेत्रो की असारता (निन्दनीयता) दिखलाते हैं। हे प्रियजन, त्वचा, मांस, रक्त और अश्रुजल को अलग करके नेत्र को देखो, यदि वह रमणीय है, तो उस पर आसक्ति करो | यदि रमणीय नहीं है, तो क्यों व्यर्थ ही उस पर मोहित होते हो, अर्थात्‌ नेत्र त्वचा, मांस, रक्त और आँसू इनसे अतिरिक्त वस्तु नहीं है, इन्हींके समुदाय का नाम नेत्र है, भला बतलाओ तो, त्वचा आदि में गर्हितता के सिवा रमणीयता क्या है ?