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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

इतः केशा इतो रक्तमितीयं प्रमदातनुः । किमेतया निन्दितया करोति विपुलाशयः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

रत्री का शरीर क्या है, उसका कुछ अंश केश है, कुछ अंश रक्त है और कुछ अंश मांस आदि हैं, इन सबमें रम्यता कहाँ है ? ये सब नितान्त घृणास्पद ओर हेय हैं, इस कारण विवेकसम्पन्न प्राज्ञ पुरुष को स्त्री के शरीर से क्या काम है ? अर्थात्‌ वह उसे निन्दनीय ही समझते हैँ, रमणीयता का लेश भी उसमें नहीं देखते