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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

वासोविलेपनैर्यानि लालितानि पुनः पुनः । तान्यङ्गान्यङ्ग लुण्ठन्ति क्रव्यादाः सर्वदेहिनाम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे बन्धुगण, बहुमूल्य वस्त्र ओर कस्तूरी, केसर आदि के लेप से (उबटन, तेल आदि के मर्दन से) जो सम्पूर्ण मनुष्यों के शरीर कभी वारवार सुशोभित हुए थे, उन्हें समय पाकर गीध, सियार आदि मांसाहारी जीव नोच- दबोच कर खाते हैं । यही उनका अंतिम परिणाम है