Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
ललनालानसंलीना मुने मानवदन्तिनः ।
प्रबोधं नाधिगच्छन्ति दृढैरपि शमाङ्कुशैः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिजी, ललनारूपी आलान में
(हाथी को बाँधने के स्तम्भ में) मदरूपी मोह से सोये जैसे मनुष्यरूपी हाथी परिपक्व (अंकुश के पक्ष में
कठोर) शमरूपी अंकुश के प्रहारों से विवेक (हाथी के पक्ष में जागरण) को प्राप्त नहीं होते हैं । अर्थात्
जैसे बन्धन-स्तम्भ में मद से सुप्तप्राय हाथी कठोर अंकुश के प्रहारों से नहीं जागता, वैसे ही स्त्री के
समीप मोहवश सुप्तप्राय मनुष्य तीव्र शम, दम आदि से विवेक को प्राप्त नहीं होते