Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
केशकज्जलधारिण्यो दुःस्पर्शा लोचनप्रियाः ।
दुष्कृताग्निशिखा नार्यो दहन्ति तृणवन्नरम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे काजल
को धारण करनेवाली अग्नि की ज्वाला, दाहक होने के कारण छूने के अयोग्य है ओर नेत्रो को प्रिय
लगनेवाली अग्नि की ज्वाला तिनको को जला डालती हे, वैसे ही केश ओर काजल को धारण करनेवाली,
छूने के अयोग्य, नेत्रौँ को सुखदायक (मनोहर) पापरूपी अग्नि की ज्वालारूप स्त्रियो मनुष्य को जला
डालती हैं