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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

भूतपञ्चकसंघट्टसंस्थानं ललनाभिधम् । रसादभिपतत्वेतत्कथं नाम धियान्वितः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे संसारस्थित लोगों, स्त्री के अंगों का थोड़े ही काल में होनेवाला यह परिणाम मैंने आप लोगों से कहा, उसमें आप लोग क्यों मोह कर रहे हैं ? ऐसे नाशवान्‌ स्त्री के शरीर की सुन्दरता ओर सत्यता का भ्रम निर्मूल है ॥ ३ ०॥ स्त्री क्या है ? पांच भूतों के समुदाय से बना हुआ अंगों का संगठन ही स्त्री । तनिक भी विवेक-बुद्धिवाला पुरुष राग का वशवर्ती होकर उस पर कैसे आसक्त हो सकता है, अर्थात्‌ जो अज्ञानी है, वे भले ही उसे सत्‌ या उपादेय समझें पर ज्ञानी उसको कैसे उपादेय समझेगा ?