Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verses 32–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 32-34
संस्कृत श्लोक
शाखाप्रतानगहना कट्वम्लफलमालिनी ।
सुतालोत्तालतामेति चिन्ता कान्तानुसारिणी ॥ ३२ ॥
कान्दिग्भूततया चेतो घनगर्धान्धमाकुलम् ।
परं मोहमुपादत्ते यूथभ्रष्टमृगो यथा ॥ ३३ ॥
शोच्यतां परमां याति तरुणस्तरुणीपरः ।
निबद्धः करिणीलोलो विन्ध्यखाते यथा गजः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
कान्तानुसारिणी (स्त्री के कारण होनेवाली) चिन्ता अनेक खट्टे (कुछ सुख से मिश्रित ऐहिक दुःख)
फलों से पूर्ण होती हुई बहुत बड़े विस्तार को प्राप्त होती है जैसे अपने यूथ से बिछुड़ा हुआ हाथी मोह
को प्राप्त होता है । (किंकर्तव्य विमूढ हो जाता है), वैसे ही उक्त चिन्ता से व्याकुल अतएव उत्कट
धनाभिलाषा से अन्ध कहाँ जाऊँ, कहाँ घन मिलेगा, यों चिन्ताग्रस्त होकर मनुष्य अत्यन्त मोह को
प्राप्त होता है जैसे हथिनी को चाहनेवाला (हस्तिनी पर आसक्त) हाथी विन्ध्याचल के गड्ढे में
(हाथियों को पकड़ने के लिए बनाये गये गड्ढे मेँ) बोधा जाता हे, वैसे ही स्त्रीलम्पट पुरुष वध, बन्धनरूप
बड़ी शोचनीय अवस्था को प्राप्त होता हे