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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

आपातरमणीयत्वं कल्पते केवलं स्त्रियाः । मन्ये तदपि नास्त्यत्र मुने मोहैककारणम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल अविचार से ही लोगों ने स्त्री में रमणीयता की कल्पना कर रक्खी है, परन्तु मेरे मत से स्त्रीशरीर में अविचारजनित रमणीयता भी नहीं है, क्योकि स्त्री मेँ जो रमणीयता की प्रतीति होती है, उसका कारण एकमात्र मोह है। सीप में जो चाँदी की कल्पना होती है, वहाँ पर सीपरूप अधिष्ठान और अज्ञान दोनों रहते हैं, किन्तु यहाँ पर अधिष्ठान का अभाव है, अतएव यह केवल अज्ञानजनित ही है