Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 21, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 21, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
रक्तमांसास्थिदिग्धानि करभस्य यथा वने ।
तथैवाङ्गानि कामिन्यास्तां प्रत्यपि हि को ग्रहः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे वन में चरनेवाले गदहे या ऊँट के अंग रक्त, मांस
और इड्डियों द्वारा बने हैं, वैसे ही स्त्री के अंग भी उन्हीं उपकरणों द्वारा बने हैं, फिर उसीके लिए इतना
आग्रह (अधिक आदर) क्यों ? अर्थात् गदहे का शरीर जिस सामग्री से बना है, स्त्री का शरीर भी उसी
तुच्छ ओर घृणित सामग्री से बना है, अतः वह भी उक्त जीवों के समान ही घृणित है