Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
कोऽहं वराकः किमिव करोमि कथमेव च ।
तिष्ठामि मौनमेवेति दीनतोदेति वार्धके ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
हे महर्षे, मैं
कौन हूँ, बड़ा दुःखी-दीन हूँ, मैं क्या करूँ, कैसे करूँ, अच्छा चुपचाप मौन ही रहूँ, ऐसी दीनता वृद्धावस्था
में प्राप्त होती है अर्थात् वृद्धावस्था में मैं दुःखी हूँ, मेँ अकर्मण्य हू, मेँ नितान्त हेय ओर तुच्छ हूँ, मे क्या
करूँ, मुझ में सामर्थ्य ही क्या है, किस प्रकार मैं अपना जीवननिर्वाह करूँ, मेरा बोलने से क्या प्रयोजन
है, अच्छा, मैं मोन ही रहता हूँ, इत्यादि प्रकार की दीनता उदित होती है