Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
सायंसंध्यां प्रजातां वै तमः समनुधावति ।
जरां वपुषि दृष्ट्वैव मृतिः समनुधावति ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सायंकाल की सन्ध्या के
उत्पन्न होने पर अन्धकार उसके पीछे दौड़ता है अर्थात् सायंकाल होने के बाद अन्धकार इधर-उधर
व्याप्त हो जाता है, वैसे ही शरीर में वृद्धावस्था को देखकर ही काल लेने के लिए समीप में दौड़ कर
आता है