Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
जराकुसुमितं देहद्रुमं दृष्ट्वैव दूरतः ।
अध्यापतति वेगेन मुने मरणमर्कटः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिश्रेष्ठ वृद्धावस्था से कपास की नाई फूले हुआ (सफेद केश और मूँछ-दाढ़ी से
युक्त) देहरूपी वृक्ष को दूर से ही देखकर कालरूपी बन्दर बड़ वेग से उसकी और दौड़ता है अर्थात् जैसे
फूलों से युक्त वृक्ष को दूर से ही देखकर बन्दर उसकी और दौड़ता है, वैसे ही वृद्धावस्था से सफेद हुए
शरीर की ओर काल दौड़ता है