Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
सीत्कारकारिणी पांसुपरुषा परिजर्जरम् ।
शरीरं शातयत्येषा वात्येव तरुपल्लवम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे धूलि के कणों से कठोर
ओर सी-सी कार करानेवाली (सी-सी शब्द करानेवाली) शिशिर ऋतु के तेज वायु वृक्ष के पत्तों को
धूलि से ध्वस्त कर छिन्न-भिन्न कर देती है, वैसे ही शरीर में कम्प करानेवाली रूसीसे कठोर यह
वृद्धावस्था शरीर को नष्ट कर देती है