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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

जरसोपहतो देहो धत्ते जर्जरतां गतः । तुषारनिकराकीर्णपरिम्लानाम्बुजश्रियम् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

वृद्धावस्था से तहस-नहस ओर जर्जरित शरीर तुषार (हिम) के कणों से व्याप्त अतएव म्लान (मुरञ्ाये हुए) कमल की समानता को धारण करता है अर्थात्‌ जैसे हिम समूह से आक्रान्त कमल मुरझा जाता है वैसे ही वृद्धावस्था से आक्रान्त शरीर भी जीर्ण-शीर्ण हो जाता है