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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verses 22–23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verses 22–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

जरा ज्योत्स्नोदितैवेयं शिरःशिखरिपृष्ठतः । विकासयति संरब्धं वातकासकुमुद्वती ॥ २२ ॥ परिपक्वं समालोक्य जराक्षारविधूसरम् । शिरःकूष्माण्डकं भुङ्क्ते पुंसां कालः किलेश्वरः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

यह वृद्धावस्थारूपिणी चाँदनी सिररूपी पर्वत के शिर से उदित होते ही वातरोग ओर खाँसीरोगरूपी कुमुदिनी को बड़े प्रयत्न से विकसित करती है अर्थात्‌ जैसे उदयाचल से उदित होते ही चाँदनी यत्नपूर्वक कुमुदिनी को विकसित करती हे वैसे ही प्रथम सिर में आविर्भूत हुई वृद्धावस्था वातरोग ओर खाँसी को खूब बढ़ा देती हैँ