Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
जराजह्नुसुतोद्युक्ता मूलान्यस्य निकृन्तति ।
शरीरतीरवृक्षस्य चलत्यायुषि सत्वरम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
भगवन्, कालरूपी स्वामी वृद्धावस्थारूपी लवणादि चूर्ण से
धूसर पुरुषों के सिररूपी कूष्माण्ड (कोहड़ा) को पका हुआ जानकर खा जाता है अर्थात् जैसे स्वामी
(किसान या अन्य कोई गृहस्थ, क्योकि वही उसको पैदा करता है, अतः वह स्वामी है) क्षार चूर्ण से
धूसर कोहड को पका हुआ जानकर खा जाता हे, वैसे ही काल भी मनुष्यों के सिर को वृद्धावस्था से
सफेद हुआ देखकर खा जाता हे ॥२ ३॥ आयुरूपी प्रवाह के शीघ्र चलनेपर वृद्धावस्थारूपी गंगा लगातार
प्रयत्नपूर्वक इस शरीररूपी तटवृक्ष की जड़ों को काट डालती है, अर्थात् जैसे प्रवाह तेज होने पर गंगा
तीरस्थित वृक्ष की जड़ों को काटकर उसे गिरा देती हे, वैसे ही आयु के पूर्ण होने पर वृद्धावस्था लगातार
शरीर की जड़ों (शरीर के आधार बल आदि) को काटकर उसे गिरा देती है