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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

कासश्वासससीत्कारा दुःखधूमतमोमयी । जराज्वाला ज्वलत्येषा यस्यासौ दग्ध एव हि ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

खाँसी और साँस के साँय-साँय शब्द से युक्त दुःखरूपी धुँआ और कालिख से पूर्ण यह वृद्धावस्थारूपी ज्वाला जलती है, जिसने इस देह को जला ही डाला अर्थात्‌ गीली लकड़ियों के जलने पर ज्वाला सीं -सीं शब्द करती है ओर उसमें घुँआ ओर कालिख भी रहती है, अतएव जैसे सीं-सीं शब्द से युक्त ओर धूममय और कालिखपूर्णं ज्वाला काष्ठ को जला देती है वैसे ही कास श्वास की साँय-साँय से युक्त ओर दुःखमय यह (०७) वृद्धावस्था भी देह को जला देती है