Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
जरसा वक्रतामेति शुक्लावयवपल्लवा ।
तात तन्वी तनुर्नृणां लता पुष्पानता यथा ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सफेद पत्तोवाली ओर फूलों से लदी
२ वृद्धावस्था में नेत्रो की ज्योति के कुछ कम क्षीण होने पर धूममय प्रकाश दिखाई देता है ओर
बहुत अधिक क्षीण होने पर अन्धकार हो जाता है, अतः धूममय और अन्धकारमय विशेषण भी जरा में
लग सकते हैं ।
हुई छोटी लता, फूलों के बोझ को न सह सकने के कारण, टेढी हो जाती है, वैसे ही सफेद सम्पूर्ण अंगों
से युक्त मनुष्यों का छोटा-सा शरीर वृद्धावस्था से टेढ़ा हो जाता है