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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verses 29–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verses 29–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

जराकर्पूरधवलं देहकर्पूरपादपम् । मुने मरणमातङ्गो नूनमुद्धरति क्षणात् ॥ २९ ॥ मरणस्य मुने राज्ञो जराधवलचामरा । आगच्छतोऽग्रे निर्याति स्वाधिव्याधिपताकिनी ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

वृद्धावस्थारूपी कपूर से सफेद देहरूपी केले के पेड को कालरूपी हाथी निःसन्देह एक क्षण में उखाड़ कर फेंक देता है अर्थात्‌ जैसे कपूर से सफेद केले के पेड को हाथी अनायास उखाड़कर फेक देता है वैसे ही मृत्यु भी वृद्धावस्था से सफेद देह को निःसन्देह क्षणभर में उखाड़कर फेंक देती है