Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
जर्जरीकृतसर्वाङ्गी जरा जरठरूपिणी ।
विरूपतां नयत्याशु देहं विषलवो यथा ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि विष का छोटा-सा टुकड़ा खा लिया जाय, तो वह
जैसे थोड़ी देर मेँ देह को कुरूप कर देता है, वैसे ही अंग-प्रत्यंग को शिथिल करनेवाली एवं वृद्धकेसे
स्वरूपवाली वृद्धावस्था देह को शीघ्र (आते ही) कुरूप कर देती है। यदि वृद्धावस्था स्वयं वृद्धरूप न
होती तो अन्यं को वृद्धरूप कैसे करती, ऐसे तर्क करके लोक में जरठरूपिणी कहा है