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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

जरातुषारवलिते शरीरसदनान्तरे । शक्नुवन्त्यक्षशिशवः स्पन्दितुं न मनागपि ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

वृद्धावस्थारूपी हिम से संकुचित (चारों और हिम से पूर्ण हो जाने के कारण कम अवकाशवाले) शरीररूपी गृह के मध्य में इन्द्रियरूपी बच्चे तनिक भी हिलने-डुलने को समर्थ नहीं हो सकते अर्थात्‌ जैसे हिम से परिपूर्ण घर के अन्दर बालक इधर-उधर चल-फिर नहीं सकते, वैसे ही वृद्धावस्था से पूर्ण शरीर में इन्द्रियाँ अपना कुछ भी व्यापार नहीं कर सकती