Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 22, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 22, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
दैन्यदोषमयी दीर्घा हृदि दाहप्रदायिनी ।
सर्वापदामेकसखी वार्धके वर्धते स्पृहा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
दीनतारूपी दोष से परिपूर्ण, हृदय में सन्ताप पहुँचानेवाली और सम्पूर्ण आपत्तियों की एकमात्र सहचरी
बड़ी भारी तृष्णा वृद्धावस्था में बढ़ती जाती है