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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । विकल्पकल्पनानल्पजल्पितैरल्पबुद्धिभिः । भेदैरुद्धुरतां नीतः संसारकुहरे भ्रमः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार भोग्य श्री, भोगतृष्णा ओर भोगकाल के बाल्यावस्था, युवावस्था ओर वृद्धावस्था के दोषों का विस्तारपूर्वक वर्णन कर और ये अन्त में केवल असीम दुःख के ही कारण होते हैं, ऐसा उपपादन कर श्रीरामचन्द्रजी ने ऐहिक और परलौकिक पदार्थ ओर उनके फलों में अपना वैराग्य दथया। अव काल आदि के स्वभाव के वर्णन द्वारा नित्य ओर अनित्य पदार्थो का विवेक दशनि के लिए भूमिका बोधते है। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, मेरी यह भोग्य वस्तु है, मैं इसका भोग करनेवाला हूँ, ये भोग के उपकरण हैँ, इस उपकरण से (साधन से) इस वस्तु को हस्तगत कर मेँ चिरकाल तक इसका भोग करूँगा, मेरा यह मनोरथ आज पूर्ण हो गया, मुझे आशा है कि इस दूसरे मनोरथ को भी मेँ शीघ्र प्राप्त कर लंगा इत्यादि असंख्य मानसिक संकल्पविकल्पां द्वारा अनन्त व्यावहारिक वचनों से पूर्ण एवं तुच्छ शरीर में आत्मबुद्धि करनेवाले या अल्प वैषयिक सुख में पुरुषार्थ-बुद्धि करनेवाले मूढो ने शत्रु, मित्र, उदासीन आदि भेदों से, हेय, उपादेय ओर उपेक्षणीय आदि भेदों से ओर तत्प्रयुक्त राग-द्वेषादि भेदं से संसाररूपी छिद्र में अन्यथाग्रहरूपी भ्रम को दुश्च्छेद्य बना दिया है

सर्ग सन्दर्भ

लाईसर्वौ सर्ग समाप्त तेईसवाँ सर्ग॑ प्राणियों के पुण्य ओर पाप के बल से उत्कृष्ट अपनी चेष्टाओं द्वारा प्राणियों से कर्म करा रहे काल का वर्णन |