Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
हरत्ययं नाशयति करोत्यत्ति निहन्ति च ।
कालः संसारनृत्तं हि नानारूपं यथा नटः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे ऐन्द्रजालिक
अपने विविध खेलों को आरम्भ करता है, उनका अन्त कर डालता है, उनको बिगाड़ देता है, कोई खाद्य
पदार्थ बनाकर उसे खा जाता है और बरबाद कर देता है, वैसे ही यह काल भी अपने विविधरूपवाले
संसाररूपी नृत्य को आरम्भ करता है, बन्द कर देता है, बिगाड़ देता है, खा जाता है और नष्ट कर देता
है अर्थात् धन-सम्पत्ति आदि में जो कुछ भी हरण, नाश, व्यय आदि होते हैं, उन सबको हरणकर्ता,
नाशकर्ता आदि के रूप से स्थित काल ही करता है, दूसरा नहीं