Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
कालः कवलनैकान्तमतिरत्ति गिरन्नपि ।
अनन्तैरपि लोकौघैर्नायं तृप्तो महाशनः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
इसका चित्त सदा निगलने में ही लगा रहता है, यह एक को निगलता हुआ दूसरे को निगलता
है। असंख्य लोग इसकी उदरदरी मेँ समा चुके हैं, पर यह ऐसा पेटू है कि इसे तृप्ति ही नहीं हुई अर्थात्
अब भी यह अपने उसी स्वाभाविक वेग से जीवों को लगातार निगलता जा रहा हे