Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verses 30–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 30,31
संस्कृत श्लोक
क्वचिच्छयामतमःश्यामं क्वचित्कान्तियुतं ततम् ।
द्वयेनापि क्वचिद्रिक्तं स्वभावं भावयन् स्थितः ॥ ३० ॥
संलीनासंख्यसंसारसारया स्वात्मसत्तया ।
उर्व्येव भारघनया निबद्धपदतां गतः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
यह काल कहीं पर (रात्रि आदि
काले पदार्थो मेँ) काले अन्धकार के तुल्य श्यामल, कहीं पर (दिन, चाँदनी, मणि आदि प्रकाशमान
पदार्थो मे) कान्ति से परिपूर्ण ओर कहीं पर (भण्डार ओर भीत आदि में) अन्धकार ओर कान्ति से शून्य
अपने कार्य को करता हुआ स्थित है । यह विलीन हुए असंख्य प्राणिपूर्णं संसारो के सारभूत ओर सबका
आधार होने से अत्यन्त भार से युक्त अपने स्वरूप से पृथिवी के समान ऐसा स्थित है कि इसकी जड़
कभी भी हिल नहीं सकती