Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
गृहीत्वा कृपणः कृष्णां रजनीं जीर्णमार्जनीम् ।
आलोककनकक्षोदानाहरत्यभितो गिरिम् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह लोभी काल पुरानी सम्मार्जनी (वुहारी) रूपी काली रात्रि को लेकर कनकाचल
के (सुमेरु के) चारों ओर उससे गिरे हुए आलोकरूपी सुवर्णं के कणों को बटोरता रहता हे । एक बार
झाड़ू से बटोरने पर बहुत-सा सुवर्णं मिलनेपर भी यह सन्तुष्ट नहीं होता ओर लोभी इतना बड़ा है कि
नई सम्मार्जनी भी नहीं ले सकता, यह भाव है