Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
न तदस्तीह यदयं कालः सकलघस्मरः ।
ग्रसते तज्जगज्जातं प्रोत्थाब्धिमिव वाडवः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे बडवाग्नि चन्द्रोदय आदि से उमड़े हुए समुद्र को नष्ट करती है, वैसे ही इस
संसार में उत्पन्न हुई ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे यह सर्वभक्षी काल न नष्ट करता हो, अर्थात् जैसे
बड़वाग्नि प्रतिदिन समुद्र को सोखती है, वैसे ही यह सर्वभक्षी काल भी प्रत्येक वस्तु को निगलता
है