Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 23, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 23, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
शैलार्णद्युधराशृङ्गजगदूर्णायुसौनिकः ।
प्रत्यहं पिबते प्रेक्ष्य तारारक्तकणानपि ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
पर्वत, समुद्र, द्युलोक और पृथिवीरूप चार श्रृंगवाले जगत्रूपी भेड़ों का
हिंसक यह काल आकाशरूपी आँगनमें बिखरे हुए तारारूपी रक्त के बिन्दुओं को भी देखकर प्रतिदिन
उन्हें चाटता है