Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 25, Verses 14–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 25, verses 14–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 14-21
संस्कृत श्लोक
कस्तूरिकातिलककं क्रियासंख्योपकल्पितम् ।
चित्रितं चित्रगुप्तेन यमे वदनपट्टके ॥ १४ ॥
कालास्यं समुपादाय कल्पान्तेषु किलाकुला ।
नृत्यत्येषा पुनर्देवी स्फुटच्छैलघनारवम् ॥ १५ ॥
पश्चात्प्रालम्बविभ्रान्तकौमारभृतबर्हिभिः ।
नेत्रत्रयवृहद्रन्ध्रभूरिभाङ्कारभीषणैः ॥ १६ ॥
लम्बलोलजटाचन्द्रविकीर्णहरमूर्धभिः ।
उच्चरच्चारुमन्दारगौरीकबरचामरैः ॥ १७ ॥
उत्ताण्डवाचलाकारभैरवोदरतुम्बकैः ।
रणत्सशतरन्ध्रेन्द्रदेहभिक्षाकपालकैः ॥ १८ ॥
शुष्कशारीरखट्वाङ्गभरैरापूरिताम्बरम् ।
भीषयत्यात्मनात्मानं सर्वसंहारकारिणी ॥ १९ ॥
विश्वरूपशिरश्चक्रचारुपुष्करमालया ।
ताण्डवेषु विवल्गन्त्या महाकल्पेषु राजते ॥ २० ॥
प्रमत्तपुष्करावर्तडमरोड्डामरारवैः ।
तस्याः किल पलायन्ते कल्पान्ते तुम्बुरादयः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्रगुप्त प्राणियों के कर्मरूपी सुगन्ध को प्रकट
करता है, अतः वह कस्तूरीस्वरूप है। उक्त कस्तूरीभूत चित्रगुप्त से क्रियारूपी सखी द्वारा उसके
यमरूप कपाल में सुन्दर तिलक बनाया गया है । भाव यह है कि यम इस नियति का ललाट (८) है और
चित्रगुप्त उसमें स्थित कस्तूरी तिलक है, उसे क्रियारूपी सखीने तैयार किया है। प्रलयकाल में काल की
प्रिय पत्नी यह नियतिदेवी अपने पति काल के इंगितपूर्ण मुख के अभिप्राय को जानकर बड़ी चंचलता के
साथ फिर नाचना आरम्भ कर देती है। इसके नाचने में चट्टानों के टूटने का सा घोर शब्द होता हे । वह
नियतिदेवी महाप्रलयों में नाचने के समय पृष्ठ भाग में गले से सीधी लटक रही माला में चंचल कार्तिकेय
के वाहनरूप मृत मयूरों से शोभित होती है । लम्बमान चंचल जटाओं में चन्द्रमासे लांछित महादेवजी के
मुण्डों से, जो तीन नेत्रों के बड़े-बड़े छिद्रों से निकल रहे विपुल भाँय-भाँय शब्द से भयंकर प्रतीत होते
हैं, विकसित मन्दार के पुष्पों से शोभित श्रीपार्वतीजी के केशरूपी चँँवरों से, ताण्डव के समय पर्वताकार
हुए संहारभेरव के उदररूपी तुम्बों से और एक हजार सात छेदो ([)) से युक्त इन्द्र की देहरूपी
भिक्षापात्रों से (खप्परों से), जो नाचने के समय खनखन शब्द करते हैं, बडी शोभित होती है सबका
संहार करनेवाली यह नियति देवी सूखे हुए नर-कंकालरूपी खट्ठांगों से (पाटियों से) आकाशमण्डल को
पूर्णकर अपने को आप ही भयभीत करती है। नाचने के समय हिल रही जीवों के भाँतिभाँति के मस्तकरूपी
सुन्दर कमलों की माला से इसकी शोभा की सीमा नहीं रहती । प्रलय के समय नियतिदेवी के उद्धत
प्रलयकाल के मेघरूपी मरू के भीषण शब्दों से तुम्बुरु आदि गन्धर्व भागते हैं