Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 25, Verses 7–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 25, verses 7–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 7-13
संस्कृत श्लोक
शेषः शशिकलाशुभ्रो गङ्गावाहश्च तौ त्रिधा ।
उपवीते अवीते च उभौ संसारवक्षसि ॥ ७ ॥
चन्द्रार्कमण्डले हेमकटकौ करमूलयोः ।
लीलासरसिजं हस्ते ब्रह्मन्ब्रह्माण्डकर्णिका ॥ ८ ॥
ताराबिन्दुचितं लोलपुष्करावर्तपल्लवम् ।
एकार्णवपयोधौ तमेकमम्बरमम्बरम् ॥ ९ ॥
एवंरूपस्य तस्याग्रे नियतिर्नित्यकामिनी ।
अनस्तमितसंरम्भमारम्भैः परिनृत्यति ॥ १० ॥
तस्या नर्तनलोलाया जगन्मण्डपकोटरे ।
अरुद्धस्पन्दरूपाया आगमापायचञ्चुरे ॥ ११ ॥
चारुभूषणमङ्गेषु देवलोकान्तरावली ।
आपातालं नभोलम्बं कबरीमण्डलं बृहत् ॥ १२ ॥
नरकाली च मञ्जीरमाला कलकलोज्ज्वला ।
प्रोता दुष्कृतसूत्रेण पातालचरणे स्थिता ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके हस्ताभरण हैं और सुमेरू पर्वत उसके हाथ में स्थित लीलाकमल है। प्रलयकाल के सागर में धोया
गया असीम आकाश उसका एकमात्र वस्त्र है। वह तारारुपी चित्र-विचित्र विन्दु ओं से व्याप्त है और प्रलय
के पुष्कर ओर आवर्तं नाम के मेघ उसके चंचल छोर हैं । इस प्रकार के कृतान्तरूप काल के सामने उसकी
भार्या नियति आलस्यरहित होकर लगातार प्राणियों के समुचित भोगानुरूप कार्यारम्भ द्वारा नाचती है ।
नियति की क्रियाशक्ति कभी क्षीण नहीं होती और नृत्य करने के कारण उसके अंग प्रत्यंग सदा चंचल
रहते हैं। उसका नाच देखनेवाले प्राणियों के जन्म और नाश से चंचल जगत्-मण्डलरूपी कोठरी में नाच
रही उस नियति के अंगों मे देवलोक सहित अन्य लोकों की पंक्ति सुन्दर भूषण हैं और पातालपर्यन्त
आकाश उसका लम्बमान बड़ा भारी केशों का जूड़ा हे । प्राणियों के रोदन के कोलाहल से गुलजार और
नरक की अग्नियों से देदीप्यमान नरकों की पंक्ति उसके पातालरूप चरण में स्थित मंजीरमाला पाजेब
है और वह पापरूपी तागे से पिरोई गई है