Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 27, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
कीर्त्या जगद्दिक्कुहरं प्रतापैः श्रिया गृहं सत्त्वबलेन लक्ष्मीम् ।
ये पूरयन्त्यक्षतधैर्यबन्धा न ते जगत्यां सुलभा महान्तः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
भाग्योदय हुए बिना कीर्ति, प्रताप, लक्ष्मी आदि छोटे-मोटे फल भी, धैर्य आदि के नाशक राग,
लोभ आदि की प्रबलता के कारण, जब दुर्लभ होते हैं, तब महाफल मोक्ष तो भाग्योदय हुए बिना हो नहीं
सकता, इसमें कहना ही क्या है ? इस अभिप्राय से कहते हैं ।
जो महापुरुष कीर्ति से संसार को, प्रतापों से दिशाओं को, सम्पत्ति से याचकों और क्षमा, विनय,
उदारता आदि सात्विक बल से (& ) लक्ष्मी को पूर्ण करते हैं, कभी क्षीण न होनेवाले धैर्य से परिपूर्ण
ऐसे महापुरुष पृथिवी में सुलभ नहीं है