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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 27, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

अप्यन्तरस्थं गिरिशैलभित्तेर्वज्रालयाभ्यन्तरसंस्थितं वा । सर्वं समायान्ति ससिद्धिवेगाः सर्वाः श्रियः सन्ततमापदश्च ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

भाग्योदय होने पर सव जगह अभीष्ट वस्तु प्राप्त हो जाती है, इसलिए पुरुष का प्रयत्न विफल है, इस अभिप्राय से कहते हैं। पहाड़ की शिलामय चट्टान के भीतर स्थित भी एवं वर से बने हुए घर के भीतर बैठे हुए भी भाग्यशाली पुरुष के पास सम्पूर्ण अणिमा आदि सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ बड़े वेग के साथ आ जाती हैं, जैसे कि आपत्तियाँ आती हैं अर्थात्‌ जैसे बुरे दिनों में आपत्तियाँ अनायास प्राप्त हो जाती हैं, वैसे ही भले दिनों में सम्पत्तियाँ और सिद्धियाँ भी अपने आप वेगपूर्वक आ जाती हैं