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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verses 13–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 27, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

पुत्राश्च दाराश्च धनं च बुद्ध्या प्रकल्प्यते तात रसायनाभम् । सर्वं तु तन्नोपकरोत्यथान्ते यत्रातिरम्या विषमूर्च्छनैव ॥ १३ ॥ विषादयुक्तो विषमामवस्था मुपागतः कायवयोवसाने । भावान्स्मरन्स्वानिह धर्मरिक्तान् जन्तुर्जरावानिह दह्यतेऽन्तः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

पूज्यवर, भ्रान्तिवश पुत्र, स्तर्यो, धन आदि जो सम्पूर्णं रसायन के समान सुखसाधन समझे जाते हैं, मृत्युकाल आने पर वे पुत्र आदि अतिरमणीय भोगजनक विषय कुछ नहीं करते, परन्तु विष की मूर्च्छा के समान अत्यन्त दुःखदायी ही होते हैं शरीर की बाल्य आदि अवस्थाओं के अवसान मेँ अर्थात्‌ वृद्धावस्था मेँ दुःखमय विषमावस्था को प्राप्त हुआ अतएव दुःखी जीर्ण पुरुष इस लोक में अपने पुण्यसंचयशून्य अतीत कर्मो का स्मरण कर दुःसह अन्तर्दाह से जलता है