Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 27, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
कामार्थधर्माप्तिकृतान्तराभिः क्रियाभिरादौ दिवसानि नीत्वा ।
चेतश्चलद्बर्हिणपिच्छलोलं विश्रान्तिमागच्छतु केन पुंसः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
मनुष्य जीवन के आरम्भ में कमाने की ओर भोगतृष्णा की
प्रबलता से मोक्षमार्गका परित्याग कर केवल काम और अर्थ की चिन्ता से युक्त होता है और तदनुसारी
कार्यो मेँ वह समय को बिताता हे । फिर वृद्धावस्था आने पर मयूर के चंचल पंखों के समान कम्पमान
पुरुष का चित्त किस कर्म से शान्ति को प्राप्त हो ? अर्थात् चित्त की शान्ति के साधनभूत कर्म तो उसने
कभी किये ही नहीं, फिर उसका चित्त शान्त कैसे होगा ?