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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 27, Verse 16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के वैराग्य प्रकरण, सर्ग 27, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

पुरोगतैरप्यनवाप्तरूपैस्तरङ्गिणीतुङ्गतरङ्गकल्पैः । क्रियाफलैर्दैववशादुपेतैर्विडम्ब्यते भिन्नरुचिर्हि लोकः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

जो लोग धर्मोपार्जन नहीं करते, उनके चित्त में भले ही शान्ति न हो; पर धर्मोपार्जन करनेवाले आप लोगों के मन में, धर्म के फल के लाभ से, शान्ति क्यो न विराजमान होगी ? ऐसी आशंका कर धर्म के फल स्वर्ग, पुत्र आदि भी कोई सारवान्‌ पदार्थ नहीं है, ऐसा कहते हैं। & क्षमा, विनय, उदारता आदि से लक्ष्मी पूर्ण-सी प्रतीत होती है । अनात्मा में प्रीति करनेवाले लोग भाग्यवश प्राप्त हुए, सामने स्थित भी, नदीकी ऊँची तरंगों के समान शीघ्र नष्ट हो जानेवाले अतएव अप्राप्तप्राय क्रियाफल स्वर्ग आदि द्वारा वंचित होते हैं, ठगे जाते हैं। भाव यह कि वही लाभ सच्चा लाभ है, जो प्राप्त होकर नष्ट नहीं होता और जिससे अनर्थ नहीं होता, दूसरा लाभ तो केवल वंचनामात्र ही है, जैसे कि अल्पायु पुत्र की प्राप्ति और मछली को बंशी में लगे हुए खाद्य की प्राप्ति । उक्त लाभ से किसी प्रकार का आश्वासन नहीं हो सकता